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राघव खन्ना

बनारस से लगभग आठ सौ किलोमीटर दूर, देश की राजधानी दिल्ली के एक बेहद पॉश और अत्याधुनिक कॉरपोरेट ऑफिस के पचासवें फ्लोर पर एक मीटिंग चल रही थी। यहाँ का माहौल बनारस के घाटों या सीमेंट फैक्ट्रियों जैसा देहाती नहीं था; यहाँ अपराध सफेद कॉलर पहनकर, वातानुकूलित कमरों में करोड़ों के लीगल बिज़नेस की आड़ में सांस लेता था।

शीशे की विशाल मेज के मुख्य छोर पर बैठा था राघव खन्ना। उम्र लगभग पैंतीस साल, स्लिम और फिट बदन, चेहरे पर फ्रेंच कट दाढ़ी, और आँखों में एक शातिर, ठंडी और क्रूर चालाकी। राघव खन्ना उत्तर भारत के सबसे बड़े हथियारों और अफीम के सिंडिकेट का सरगना था, जिसका नेटवर्क दुबई से लेकर बैंकॉक तक फैला था।

"सिंहानिया एक बेवकूफ था," राघव ने अपनी वाइन का ग्लास टेबल पर रखते हुए बहुत ही ठंडे लहजे में कहा। "वह एक लड़की के चक्कर में 'द बीस्ट' से सीधे टकरा गया और अपना पूरा साम्राज्य गंवा बैठा। बनारस का रूट हमारे लिए बहुत ज़रूरी है। अगर नेपाल से आने वाला माल रोकना पड़ा, तो हमें करोड़ों का नुकसान होगा।"

उसकी लीगल टीम के हेड ने एक टैबलेट आगे बढ़ाते हुए कहा, "सर, बीस्ट को कानून या पुलिस से नहीं डराया जा सकता। बनारस का पूरा प्रशासन उसकी जेब में रहता है। लेकिन हमारी खुफिया रिपोर्ट कहती है कि उस पत्थर दिल इंसान की एक कमज़ोरी अब उसके अपने महल में कैद है—कशिश।"

राघव के होठों पर एक बेहद ज़हरीली और शातिर मुस्कान उभर आई। "बीस्ट ने सिंहानिया को मारा क्योंकि सिंहानिया ने उस लड़की को नुकसान पहुँचाने की कोशिश की थी। लेकिन हम सिंहानिया नहीं हैं। हम बीस्ट पर वार सीधे नहीं करेंगे... हम बनारस के भीतर ही उसके अपने वफ़ादारों में फूट डालेंगे। समीर... जो बीस्ट का राइट-हैंड है, उसके भाई को हमने दिल्ली पुलिस के एक फर्जी केस में फंसा रखा है। समीर को हमारे साथ आना ही होगा।"

अस्पताल की उस भावुक मुलाकात को बीते तीन दिन हो चुके थे। शास्त्री जी की हालत में तेज़ी से सुधार हो रहा था, और उन्हें यह तसल्ली थी कि उनकी बेटी सुरक्षित है। कशिश अब 'द किंगडम' के माहौल में खुद को ढालने की कोशिश कर रही थी। वह अब बीस्ट से उतना नहीं डरती थी जितना पहले दिन डरती थी। उसने देखा था कि जो मर्द पूरी दुनिया के लिए आदमखोर है, वह उसके सामने आते ही कितना शांत और सुरक्षात्मक हो जाता है।

शाम का समय था। बनारस की ठंडी हवाएं महल के विशाल टैरेस पर लगे पर्दों को हिला रही थीं। कशिश हल्के नीले रंग के अनारकली सूट में वहाँ खड़ी नीचे बहती गंगा नदी को देख रही थी। तभी पीछे से भारी बूटों की जानी-पहचानी धमक सुनाई दी।

बीस्ट वहाँ आया। उसने ब्लैक कलर का टक्सीडो पहन रखा था, और उसकी आँखों में हमेशा रहने वाली वो डार्क दीवानगी कशिश को देखते ही थोड़ी नर्म हो गई। उसने अपनी जेब से एक बहुत ही खूबसूरत, मखमली डिब्बी निकाली और कशिश की तरफ बढ़ा दी।

"यह क्या है?" कशिश ने अपनी बड़ी-बड़ी, मासूम आँखों से बीस्ट की तरफ देखते हुए पूछा।

"खोलो इसे," बीस्ट ने बहुत ही शांत लेकिन कड़क आवाज़ में कहा।

कशिश ने डिब्बी खोली तो उसके भीतर एक बेहद कीमती और खूबसूरत सोने का लॉकेट था, जिस पर बारीक नक्काशी से एक तरफ 'B' (Beast) और दूसरी तरफ एक 'Angel' के पंख बने हुए थे।

"यह बहुत कीमती है... मैं इसे नहीं ले सकती," कशिश ने डिब्बी को वापस बंद करना चाहा।

बीस्ट ने आगे बढ़कर कशिश के नाज़ुक हाथों को अपने बड़े, फौलादी हाथों में जकड़ लिया। उसका स्पर्श कशिश के भीतर एक सिहरन पैदा कर गया। "यह कोई तोहफा नहीं है, कशिश... यह इस बीस्ट का तुम्हारे वजूद पर एक और दावा है। इसे पहनना तुम्हारी मजबूरी भी है और मेरा हुक्म भी। जब तक यह लॉकेट तुम्हारे गले में रहेगा, पूरी दुनिया को पता रहेगा कि तुम किसकी अमानत हो।"

कशिश ने बीस्ट की आँखों में देखा। उन आँखों में कोई ज़बरदस्ती नहीं थी, बल्कि सिर्फ और सिर्फ उसे खोने का एक अनजाना खौफ था। उसने चुपचाप अपना सिर झुका लिया। बीस्ट ने खुद अपने हाथों से कशिश के रेशमी बालों को हटाकर वह लॉकेट उसके नाज़ुक गले में पहना दिया।

उसी रात, किंगडम के पिछले हिस्से में बने एक अंधेरे गैरेज के पास समीर अकेला खड़ा था। उसके हाथ में उसका फोन था, और उसका पूरा चेहरा पसीने से तर-बतर था।

"समीर..." फोन के दूसरी तरफ से राघव खन्ना के राइट-हैंड की ठंडी आवाज़ आ रही थी। "तुम्हारे छोटे भाई विवेक की ज़िंदगी अब सिर्फ हमारे एक इशारे पर टिकी है। दिल्ली पुलिस की स्पेशल सेल उसे एनकाउंटर में ढेर करने ही वाली है। अगर अपने भाई की सलामती चाहते हो, तो तुम्हें बीस्ट के अगले बड़े हथियारों के शिपमेंट की सटीक लोकेशन और टाइमिंग हमें बतानी होगी।"

समीर का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था। एक तरफ उसका सगा छोटा भाई था, और दूसरी तरफ वो 'बीस्ट' था जिसने उसे अनाथालय से उठाकर अपना भाई माना, उसे नाम और रुतबा दिया। बीस्ट पर बगावत करने का मतलब था सीधे मौत के कुएं में कूदना।

"मैं... मैं भाईसाहब के साथ गद्दारी नहीं कर सकता," समीर की आवाज़ कांपी।

"तो ठीक है, सुबह अपने भाई की लाश उठाने के लिए दिल्ली का टिकट बुक करवा लो," फोन काटने ही वाला था कि समीर ने चिल्लाकर कहा, "रुको! मैं... मैं तुम्हें लोकेशन दूँगा। लेकिन वादा करो कि मेरे भाई को एक खरोंच भी नहीं आएगी।"

समीर ने कांपते हाथों से फोन काटा। उसे नहीं पता था कि गैरेज के ऊपरी हिस्से की बालकनी में अंधेरे में खड़ा 'द बीस्ट' अपनी सिगार का कश लेते हुए नीचे देख रहा था। हालाँकि बीस्ट को समीर की बातचीत साफ़ सुनाई नहीं दी थी, लेकिन समीर की घबराहट और उसकी बॉडी लैंग्वेज ने बीस्ट की पारखी आँखों को यह इशारा दे दिया था कि बनारस की शांत हवाओं में अब गद्दारी का ज़हर घुलने लगा है।

[समीर की मजबूरी और दिल्ली के सिंडिकेट की साज़िश... क्या बीस्ट अपने सबसे वफ़ादार साथी की बगावत को भांप पाएगा? कहानी अब एक खूनी मोड़ पर आ खड़ी हुई है]

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राघव खन्ना ने बीस्ट को हराने के लिए उसके सबसे वफ़ादार समीर को मोहरा बनाया है—इस नई साज़िश पर आप क्या कहेंगे?

बीस्ट द्वारा कशिश को वो खास लॉकेट पहनाना और दोनों के बीच बढ़ती इस नज़दीकी पर आपकी क्या राय है?

अगले भाग (Chapter 8) में इस खूनी सस्पेंस को आगे बढ़ते देखने के लिए कमेंट बॉक्स में 'Next' या 'Haa' लिखना न भूलें!

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