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अतीत का साया

सिंहानिया के खात्मे के बाद पूरे बनारस के अंडरवर्ल्ड में एक ऐसा सन्नाटा पसर गया था, जिसकी दहशत हर छोटे-बड़े गैंग को महसूस हो रही थी। 'द किंगडम' के भीतर की सुबह आज कुछ अलग थी। कल रात कशिश द्वारा लिए गए उस वचन ने 'द बीस्ट' के कठोर वजूद को जैसे अंदर से बदल दिया था। महल के गलियारों में तैनात रहने वाले गार्ड्स भी आज हैरान थे, क्योंकि बीस्ट के चेहरे पर आज वो रोज़ रहने वाला खूंखार और हिंसक तनाव गायब था।

कशिश सुबह जल्दी उठ गई थी। उसने आज लाल और सफेद बॉर्डर वाली एक सादे सूती बनारसी साड़ी पहनी थी। उसने अपने बालों को सलीके से बांध रखा था, और उसके चेहरे पर अब वो पुराना जानलेवा खौफ नहीं था, बल्कि एक अजीब सा ठहराव था। उसने खिड़की से देखा, बीस्ट नीचे लॉन में खड़ा था। उसने काले रंग का ट्रैक पैंट पहन रखा था और उसका ऊपरी बदन पूरी तरह नग्न था। वह बिना रुके भारी मुगदर और पत्थरों से शारीरिक अभ्यास कर रहा था, और उसके बदन से पसीना मोतियों की तरह टपक रहा था।

कशिश चुपचाप सीढ़ियों से नीचे उतरी और रसोई की तरफ चली गई। रामू काका, जो बरसों से बीस्ट की हवेली के मुख्य रसोइए थे, कशिश को वहाँ देखकर घबरा गए।

"बहू जी... आप यहाँ क्यों आई हैं? भाईसाहब को पता चलेगा तो हमारा हुक्का-पानी बंद हो जाएगा। आप बस हुक्म कीजिए," रामू काका ने हाथ जोड़ लिए।

कशिश ने मुस्कुराते हुए कहा, "काका, आप डरिए मत। आज मैं अपने हाथों से भाईसाहब और आपके लिए नाश्ता बनाऊंगी। बस आप मुझे सामान बता दीजिए।" कशिश की उस मीठी और आदरपूर्ण आवाज़ के आगे रामू काका मना नहीं कर पाए।

आधे घंटे के भीतर कशिश ने शुद्ध घी का हलवा और गरमा-गर्म पराठे तैयार कर लिए। नाश्ते की सोंधी खुशबू जब लॉन तक पहुँची, तो बीस्ट ने अभ्यास बीच में ही रोक दिया। उसने एक सफेद तौलिए से अपना बदन पोंछा और सीधे किचन की चौखट पर आकर खड़ा हो गया। उसने देखा—उसकी एंजेल, पल्लू को कमर में बांधे, पूरी तन्मयता से काम कर रही थी।

बीस्ट बहुत ही शांत कदमों से उसके पीछे आया। "इस महल की हवाओं में आज पहली बार बारूद की जगह इतनी मीठी खुशबू महसूस हो रही है, कशिश।"

कशिश चौंककर मुड़ी। बीस्ट के उस गठीले और नग्न बदन को इतने करीब देखकर उसका चेहरा शर्म से लाल हो गया। उसने अपनी नज़रें झुका लीं। "आप... आप नाश्ता कर लीजिए। मैंने आपके लिए हलवा बनाया है।"

बीस्ट ने आगे बढ़कर कशिश के चेहरे को अपनी उंगलियों से ऊपर उठाया। उसकी आँखों में एक अजीब सा सुकून था। "अगर यह हलवा तुम्हारी उंगलियों ने बनाया है, तो यह इस बीस्ट की ज़िंदगी का सबसे अनमोल नाश्ता होगा।"

ठीक दोपहर के बारह बजे समीर बहुत ही हड़बड़ाहट में किंगडम के वीआईपी लाउंज में दाखिल हुआ। वहाँ बीस्ट और कशिश एक साथ बैठे थे। बीस्ट अपनी डायरी में कुछ बिज़नेस डील्स देख रहा था और कशिश पास ही बैठी एक किताब पढ़ रही थी।

"भाईसाहब, अस्पताल से फोन आया है," समीर ने अदब से कहा। "शास्त्री जी को पूरी तरह होश आ गया है। डॉक्टर कह रहे हैं कि उनका ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा और अब वे खतरे से बाहर हैं। वे बार-बार कशिश भाभी जी का नाम पुकार रहे हैं।"

यह सुनते ही कशिश के हाथ से किताब छूटकर गिर गई। उसकी आँखों में खुशी और व्याकुलता के आँसू छलक आए। "बाबा! मेरे बाबा ठीक हो गए! मुझे अभी उनके पास जाना है... प्लीज मुझे जाने दीजिए!" उसने बीस्ट के सामने अपने हाथ जोड़ दिए।

बीस्ट खड़ा हुआ। उसने कशिश के हाथों को अपने हाथों में लिया और बहुत ही धीमे से दबाया। "तुम्हें हाथ जोड़ने की ज़रूरत नहीं है, कशिश। मैंने तुमसे वादा किया था कि तुम्हारे पिता की सलामती मेरी ज़िम्मेदारी है। समीर, गाड़ियाँ निकालो। हम अभी अस्पताल जा रहे हैं।"

कुछ ही देर में बीस्ट का शाही काफिला शहर के सबसे बड़े सुपर-स्पेशलिटी अस्पताल के सामने रुका। सुरक्षा इतनी कड़ी थी कि अस्पताल का पूरा स्टाफ और डीसीपी रैंक के अधिकारी खुद बीस्ट के स्वागत में खड़े थे। बीस्ट और कशिश सीधे वीआईपी वार्ड की तरफ बढ़े।

जैसे ही कशिश ने कमरे का दरवाज़ा खोला, उसने देखा कि बेड पर उसके पिता शास्त्री जी तकिए के सहारे बैठे थे। कशिश दौड़कर उनके गले लग गई और फफक-फफक कर रोने लगी। "बाबूजी! आप ठीक हैं ना? मुझे बहुत डर लग रहा था।"

"मेरी बच्ची... मैं बिल्कुल ठीक हूँ," शास्त्री जी ने कांपते हाथों से कशिश की पीठ को सहलाया। लेकिन तभी उनकी नज़र दरवाजे पर खड़े शख्स पर गई। 'द बीस्ट' अपने पूरे राजसी और खूंखार रोब के साथ वहाँ खड़ा था। शास्त्री जी बनारस के पुराने वासी थे, वे पहचान गए कि यह कोई और नहीं बल्कि इस शहर का सबसे बड़ा बाहुबली है।शास्त्री जी के चेहरे पर अचानक डर और चिंता की लकीरें उभर आईं। उन्होंने कशिश को खुद से थोड़ा दूर किया और कांपती आवाज़ में पूछा, "कशिश... यह कौन हैं? और मेरा इतना महंगा इलाज इस वीआईपी अस्पताल में कैसे हुआ? मंगत राम का वो कर्जा... उस सब का क्या हुआ बेटी?"

कशिश के होठों से एक शब्द भी नहीं निकला। वह अपने पिता को कैसे बताती कि उसने अपनी आज़ादी का सौदा इस खूंखार बाहुबली से कर लिया है। वह रोते हुए अपना सिर झुकाकर खड़ी रही।

तभी बीस्ट धीरे-धीरे कदम बढ़ाता हुआ शास्त्री जी के बेड के पास आया। उसने अपनी आँखों से काला चश्मा हटाया। उसकी आँखों में शास्त्री जी के लिए कोई खौफ नहीं, बल्कि एक गहरा सम्मान था। वह झुका और उसने शास्त्री जी के पैर छुए। इस दृश्य को देखकर समीर और कमरे के बाहर खड़े गार्ड्स भी दंग रह गए—जिस बीस्ट के सामने पूरी दुनिया झुकती थी, वह आज एक गरीब पुजारी के पैरों में था।

"शास्त्री जी, आप बिल्कुल फिक्र मत कीजिए," बीस्ट की भारी और गंभीर आवाज़ कमरे में गूँजी। "मंगत राम का नामोनिशान अब इस बनारस से खत्म हो चुका है। आपका सारा कर्जा चुकता हो गया है, और यह अस्पताल मेरे संरक्षण में चलता है। आपकी बेटी पूरी तरह सुरक्षित है।"

शास्त्री जी ने बीस्ट की आँखों में देखा। वे एक अनुभवी बुजुर्ग थे, वे समझ गए कि इस बाहुबली की आँखों में उनकी बेटी के लिए क्या जज़्बात हैं। उन्होंने भारी मन से कहा, "बाहुबली जी, आप इस शहर के राजा हो सकते हैं... लेकिन हम एक छोटे और स्वाभिमानी लोग हैं। कशिश मेरी इकलौती अमानत है। बदले में आपने मेरी बेटी से क्या लिया है?"

कमरे में एक पल के लिए भारी सन्नाटा छा गया। कशिश का दिल ज़ोर-ज़ोर से धड़क रहा था।

बीस्ट ने सीधे शास्त्री जी की आँखों में देखते हुए कहा, "बदले में मैंने इससे कुछ नहीं लिया है, शास्त्री जी... बल्कि मैंने अपना यह पूरा वजूद, अपना यह साम्राज्य और अपनी हर एक सांस इसके नाम कर दी है। कशिश मेरी जागीर नहीं, मेरी 'एंजेल' है। और मैं आपसे वादा करता हूँ, जब तक इस बीस्ट के बदन में खून की एक भी बूंद बाकी है, आपकी बेटी पर कोई आंच नहीं आएगी। आपका यह बेटा अब इस परिवार की ढाल है।"

बीस्ट की इस कड़क, साफ और अटूट सच्चाई को सुनकर शास्त्री जी की आँखों से आँसू बहने लगे। उन्हें समझ आ गया था कि उनकी बेटी अब एक ऐसे पिंजरे में है, जिसकी चाबी सिर्फ प्यार और वफ़ादारी से ही खुल सकती है।

[पिता और बीस्ट के इस आमने-सामने के टकराव ने कशिश के दिल में बीस्ट के लिए सम्मान को और गहरा कर दिया है, लेकिन दिल्ली से एक नया खतरा बनारस की तरफ बढ़ रहा है]

मेरे प्यारे और वफ़ादार पाठकों! 'The Beast and His Angel' का यह छठा अध्याय (Chapter 6) आपको कैसा लगा? कमेंट बॉक्स को अपनी राय से भर दीजिए:

बीस्ट का कशिश के बीमार पिता के पैर छूना और उनके सामने एक बेटे की तरह अपनी दीवानी ज़िम्मेदारी को स्वीकार करना—बीस्ट का यह रूप आपको कैसा लगा?

शास्त्री जी को सच्चाई का अहसास होने के बाद, कशिश और बीस्ट के रिश्ते में आगे क्या मोड़ आएगा?

अगले भाग (Chapter 7) को देखने के लिए कमेंट बॉक्स में 'Next' या 'Haa' लिखना न भूलें!

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