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बनारस का सन्नाटा

रात के ठीक साढ़े तीन बज रहे थे। बनारस की संकरी गलियों से होता हुआ काली स्कॉर्पियो और मर्सिडीज का एक लंबा, भारी काफिला सीधे सिंहानिया के मुख्य ठिकाने—उसी बंद पड़ी सीमेंट फैक्ट्री की तरफ बढ़ रहा था। गाड़ियों की हैडलाइट्स कोहरे को चीर रही थीं।

काफिला फैक्ट्री के सामने आकर रुका। सबसे आगे वाली मर्सिडीज का दरवाज़ा खुला और भारी बूटों की धमक के साथ 'द बीस्ट' बाहर निकला। उसके हाथ में इस बार कोई बंदूक नहीं थी, सिर्फ दाहिने हाथ की कलाई पर वो भारी चांदी का कड़ा चमक रहा था। उसके चेहरे पर एक अजीब सी, डरावनी खामोशी थी—यह वो खामोशी थी जो किसी बड़े तूफान के आने से पहले होती है।

"समीर, अंदर कोई भी ज़िंदा नहीं बचना चाहिए। लेकिन सिंहानिया... उसे मेरे पास लाओ," बीस्ट ने सिगार सुलगाते हुए बहुत ही ठंडे लहजे में आदेश दिया।

"जी भाईसाहब!" समीर ने अपनी गन लोड करते हुए कहा।

अगले ही पल, फैक्ट्री के भीतर गोलियों की गूँज और चीखों का ऐसा तांडव शुरू हुआ जिसने रात के सन्नाटे को तार-तार कर दिया। बीस्ट के वफ़ादार लड़ाके काल बनकर सिंहानिया के गुर्गों पर टूट पड़े थे। बीस्ट खुद बहुत ही शांत कदमों से चलता हुआ फैक्ट्री के मुख्य हॉल में दाखिल हुआ। वहाँ सिंहानिया अपने बचे-खुचे दो बॉडीगार्ड्स के पीछे छिपा थर-थर कांप रहा था। वह समझ चुका था कि कशिश पर हमला करना उसकी ज़िंदगी की सबसे बड़ी और आखिरी भूल थी।

"बी... बीस्ट! मुझे छोड़ दो। मैं बनारस छोड़कर हमेशा के लिए चला जाऊँगा। तुम्हारी लड़की को मैंने छुआ तक नहीं!" सिंहानिया ने हाथ जोड़ते हुए लाचारी से कहा।

बीस्ट धीरे-धीरे उसके करीब आया। उसने अपने हाथ की जलती हुई सिगार को सिंहानिया के माथे पर सीधे बुझा दिया। सिंहानिया दर्द से चीख पड़ा।

बीस्ट ने सिंहानिया के कॉलर को पकड़ा और उसे एक ही झटके में हवा में उठा दिया। "तूने उसे छूने की बात की? तेरी परछाई भी मेरी एंजेल के कमरे तक पहुँच गई, यही तेरी मौत का सबसे बड़ा वारंट है। इस बनारस में हुक्म सिर्फ मेरा चलता है, और मेरी चीज़ पर नज़र डालने वाले को मैं इस मिट्टी में रेंगने के काबिल भी नहीं छोड़ता।"

बीस्ट ने बिना कोई रहम दिखाए, अपनी फौलादी कोहनी से सिंहानिया की छाती पर ऐसा वार किया कि उसकी पसलियाँ चटक गईं। उसने अपनी कमर से गन निकाली और बिना पलक झपकाए सिंहानिया के सीने में तीन गोलियाँ उतार दीं। पूर्वांचल का एक और बड़ा माफिया सरगना अब ज़मीन पर बेजान पड़ा था। बीस्ट ने अपनी गन वापस रखी और मुड़ा। "समीर, इस साम्राज्य को आग लगा दो। आज के बाद सिंहानिया का नाम लेने वाला भी कोई नहीं बचना चाहिए।"

सुबह के चार बज चुके थे जब बीस्ट वापस 'द किंगडम' लौटा। महल के भीतर अभी भी बारूद की गंध और धुएँ का साया था, लेकिन कशिश के कमरे की सुरक्षा अब दस गुना बढ़ा दी गई थी। कशिश अपने कमरे के एक नए, साफ़-सुथरे हिस्से में बैठी हुई थी। उसने अपने माथे पर लगे उस 'लहू के तिलक' को साफ़ पानी से धो तो दिया था, लेकिन उसकी रूह पर लगा वो निशान अब भी उसे अंदर तक झकझोर रहा था।

"वो इंसान नहीं है... वो साक्षात मौत है। लेकिन उसने अपनी जान दांव पर लगाकर मुझे बचाया। मैं उससे नफ़रत कैसे करूँ?" कशिश ने अपने दोनों हाथों में अपना चेहरा छिपा लिया और सिसकने लगी।

तभी कमरे का दरवाज़ा धीरे से खुला। बीस्ट अंदर आया। उसके चेहरे और हाथों से खून साफ़ किया जा चुका था, लेकिन उसकी आँखों की थकावट और वो डार्क दीवानगी अब भी वैसी ही थी। उसने हाथ में मलहम की एक छोटी सी डिब्बी ले रखी थी।

कशिश ने डरकर ऊपर देखा। बीस्ट को सही-सलामत देखकर उसके दिल को एक अनजानी राहत मिली, लेकिन उसका खौफ अब भी कायम था। बीस्ट बिना कुछ बोले कशिश के पास बेड पर बैठ गया। कशिश ने पीछे हटने की कोशिश की, लेकिन बीस्ट ने बहुत ही कोमलता से उसकी कलाई पकड़ ली।

"भागो मत, कशिश। मैं तुम्हें चोट पहुँचाने नहीं आया हूँ," बीस्ट की आवाज़ में इस बार वो खूंखारपन नहीं था, बल्कि एक अजीब सी नरमी थी।

उसने देखा कि कल रात की आपाधापी में कशिश की नाज़ुक कलाई पर दीवार से रगड़ खाने के कारण एक छोटा सा छिला हुआ निशान पड़ गया था, जहाँ से हल्का खून आ रहा था। बीस्ट का दिल उस मामूली सी खरोंच को देखकर तड़प उठा। उसने मलहम उंगली पर लिया और बहुत ही धीरे से, फूंक मारते हुए कशिश के ज़ख्म पर लगाने लगा।

बीस्ट की उंगलियों का वो ठंडा और सुलगता हुआ स्पर्श कशिश के बदन में एक सिहरन पैदा कर गया। उसने बीस्ट के चेहरे को इतने करीब से देखा—वहाँ कोई क्रूरता नहीं थी, बल्कि सिर्फ और सिर्फ कशिश के लिए एक बेपनाह फिक्र थी। कशिश की आँखों से एक आँसू टपक कर सीधे बीस्ट के हाथ पर गिरा।

बीस्ट ने रुककर कशिश की आँखों में देखा। "दर्द हो रहा है?" उसने बहुत ही धीमे से पूछा।

कशिश ने रोते हुए अपना सिर हिलाया। "इस ज़ख्म में दर्द नहीं है... दर्द इस बात का है कि आप कौन हैं। आप इतने लोगों की जान ले लेते हैं, आप इतने खूंखार हैं। मुझे आपसे डर लगता है। आप मुझे आज़ाद क्यों नहीं कर देते?"

बीस्ट ने मलहम की डिब्बी साइड में रखी। उसने कशिश के दोनों गालों को अपने बड़े, फौलादी हाथों के बीच में थाम लिया। कशिश को लगा कि वह अभी चिल्ला पड़ेगा, लेकिन बीस्ट की आँखों में इस समय एक गहरा समंदर उमड़ रहा था।

"इस दुनिया के लिए मैं शैतान हूँ, कशिश... और मैं अपनी यह पहचान कभी नहीं बदल सकता, क्योंकि यह बनारस खौफ से चलता है," बीस्ट ने कशिश के माथे से अपने माथे को हल्का सा छुआते हुए कहा। "लेकिन जब मैं तुम्हारे सामने आता हूँ, तो इस बीस्ट का सारा गुरूर, सारी ताकत तुम्हारे इस पावन वजूद के आगे घुटने टेक देती है। मैं तुम्हें आज़ाद नहीं कर सकता, क्योंकि तुम मेरी सांस बन चुकी हो। अगर पिंजरे से फरिश्ता उड़ गया, तो यह शैतान तड़पकर मर जाएगा।"

बीस्ट की इस बेपनाह, डार्क और रूहानी दीवानगी को सुनकर कशिश का दिल जैसे बगावत कर बैठा। वह समझ गई कि यह इंसान पूरी दुनिया के लिए काल हो सकता है, लेकिन उसके लिए वह एक ऐसा रक्षक है जो अपनी आखिरी सांस तक उसकी हिफाज़त करेगा।

कशिश ने पहली बार बीस्ट की नज़रों से नज़रे नहीं चुराईं। उसने अपनी छोटी, कांपती हथेलियों को बीस्ट के चौड़े सीने पर रखा—इस बार उसे पीछे धकेलने के लिए नहीं, बल्कि उसकी तेज़ धड़कनों को महसूस करने के लिए।

"अगर मैं इस पिंजरे में ही रही... तो क्या आप वादा करते हैं कि आप कभी किसी बेगुनाह का खून नहीं बहाएंगे?" कशिश ने अपनी मासूम आवाज़ में एक ऐसा सौदा किया जिसने बीस्ट के पत्थर जैसे दिल को पूरी तरह पिघला दिया।

बीस्ट के होठों पर एक मुकम्मल, दीवानी मुस्कान आ गई। उसने कशिश की हथेलियों को चूमते हुए कहा, "तुम्हारी हर एक बात इस बीस्ट के लिए पत्थर की लकीर है, मेरी एंजेल।"

मेरे प्यारे पाठकों! 'The Beast and His Angel' का यह पांचवा अध्याय आपको कैसा लगा?

बीस्ट का सिंहानिया को उसके अंजाम तक पहुँचाना और फिर कशिश के छोटे से ज़ख्म पर मलहम लगाते हुए अपनी दीवानगी का इकरार करना—यह बदलाव आपको कैसा लगा?

कशिश ने बीस्ट से एक बहुत बड़ा वादा ले लिया है। क्या बीस्ट अपनी एंजेल के लिए अपनी खूंखार माफिया की ज़िंदगी को थोड़ा बदल पाएगा?

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