बनारस के सबसे पॉश और सुरक्षित इलाके में स्थित 'द बीस्ट' का निजी महल, जिसे लोग और विस्मय से 'द किंगडम' कहते थे, दूर से ही किसी अभेद्य किले जैसा नजर आता था। बीस फीट ऊंचे काले लोहे के मुख्य द्वारों पर चौबीसों घंटे आधुनिक हथियारों से लैस गार्ड्स तैनात रहते थे। महल के भीतर की वास्तुकला गोथिक और आधुनिक डार्क थीम का एक अद्भुत मिश्रण थी—काले संगमरमर के फर्श, कीमती इतालवी झूमर, और दीवारों पर सजी प्राचीन तलवारें।
शास्त्री जी का ऑपरेशन पूरी तरह सफल रहा था, और उन्हें बीस्ट के निजी डॉक्टरों की देखरेख में शहर के सबसे बेहतरीन अस्पताल के वीआईपी वार्ड में रखा गया था। लेकिन कशिश के लिए इस राहत की कीमत बहुत बड़ी थी। सौदे के मुताबिक, अब वह इस किंगडम की कैदी थी... या कहें कि बीस्ट की अमानत।
महल के दूसरे फ्लोर पर स्थित एक बेहद भव्य और आलीशान कमरे में कशिश बेड के कोने पर बैठी थी। कमरे में दुनिया की हर सुख-सुविधा मौजूद थी—रेशमी पर्दों से लेकर मखमली कालीन तक। कशिश ने हल्के गुलाबी रंग का एक नया सूती सूट पहन रखा था, जो बीस्ट के आदमियों ने उसके लिए मँगवाया था। वह खिड़की के बाहर फैले विशाल बगीचे को देख रही थी, लेकिन उसकी आँखों में सिर्फ एक ही अहसास था—बेबसी।
"मैं कहाँ आ गई हूँ? बाबा ठीक हैं, लेकिन इस शैतान के चंगुल से मैं खुद को कैसे आज़ाद कराऊँगी?" कशिश ने अपने घुटनों को अपनी छाती से भींचते हुए खुद से सवाल किया।
तभी कमरे का भारी महोगनी का दरवाज़ा एक धीमी चरचराहट के साथ खुला। कशिश का दिल डर के मारे ज़ोर से धड़क उठा। उसने मुड़कर देखा, दरवाजे पर कोई और नहीं, बल्कि खुद 'द बीस्ट' खड़ा था।
उसने इस समय सफेद रंग की शर्ट पहन रखी थी, जिसके ऊपर के दो बटन खुले थे, और ब्लैक ट्राउजर था। उसके गीले बाल उसके माथे पर बिखरे थे, जिससे उसका खूंखार चेहरा और भी ज्यादा आकर्षक और रॉयल लग रहा था। उसके हाथ में कांच का एक ग्लास था, जिसमें दूध और केसर घुला हुआ था।
बीस्ट बहुत ही शांत और नपी-तुली चाल चलता हुआ कमरे के भीतर आया। उसकी भारी परछाई कशिश के नाज़ुक वजूद पर छा गई। कशिश डरकर बेड से खड़ी हुई और दो कदम पीछे हट गई, जब तक कि उसकी पीठ दीवार से नहीं जा टकराई।
"मुझसे इतना दूर भागने की कोशिश मत करो, कशिश," बीस्ट की भारी, गूँजती आवाज़ कमरे की शांति को चीरती हुई निकली। "इस पूरे किंगडम में ऐसी कोई जगह नहीं है, जहाँ तुम जाओ और मेरी नज़र तुम पर न हो।"
बीस्ट चलकर कशिश के बिल्कुल करीब आ गया। दोनों के बीच महज़ कुछ इंच का फासला था। कशिश को बीस्ट के बदन से आने वाली सिगार और चंदन की वो मर्दाना महक साफ़ महसूस हो रही थी। कशिश ने डर के मारे अपनी आँखें बंद कर लीं और अपना चेहरा दूसरी तरफ घुमा लिया।
बीस्ट ने मुस्कुराते हुए ग्लास को साइड टेबल पर रखा। उसने बहुत ही आराम से अपना बड़ा, फौलादी हाथ आगे बढ़ाया और अपनी उंगलियों से कशिश की ठुड्डी (chin) को पकड़कर उसके चेहरे को अपनी तरफ घुमाया। कशिश ने तड़पकर अपनी आँखें खोलीं। बीस्ट की उन सुलगती हुई भूरी आँखों में इस समय कशिश के लिए एक बेपनाह, डार्क दीवानगी तैर रही थी।
"छो... छोड़िए मुझे। आपने कहा था कि आप मेरे बाबा की जान बचाएंगे। आपने अपना वादा पूरा किया, मैं आपकी शुक्रगुज़ार हूँ। लेकिन मुझे यहाँ क्यों कैद करके रखा है? मुझे मेरे घर जाने दीजिए," कशिश की आवाज़ कांप रही थी, और उसकी आँखों से एक आँसू टपक कर बीस्ट की उंगली पर गिर गया।
आँसू के उस गर्म कतरे ने जैसे बीस्ट के भीतर किसी सोए हुए ज्वालामुखी को जगा दिया। उसने बहुत ही कोमलता से उस आँसू को अपने अंगूठे से पोंछा, लेकिन उसकी पकड़ ढीली नहीं हुई।
"कैद?" बीस्ट थोड़ा और नीचे झुका, उसकी सांसें कशिश के होठों को छू रही थीं। "यह कैद नहीं है, एंजेल। यह तुम्हारा नया आशियाना है। जो चीज़ इस बीस्ट की नज़रों को भा जाती है, वह हमेशा के लिए इसी पिंजरे का हिस्सा बन जाती है। तुम्हारे बाबा की सलामती इसी बात पर टिकी है कि तुम इस बीस्ट की बांहों में चुपचाप महफूज़ रहो।"
"आप बहुत बेरहम हैं! आप एक शैतान हैं!" कशिश ने गुस्से और लाचारी में आकर बीस्ट के चौड़े सीने पर अपनी दोनों हथेलियों से प्रहार किया।
लेकिन बीस्ट एक ठोस चट्टान की तरह खड़ा रहा। कशिश के इस विरोध ने उसके भीतर के जुनून को और बढ़ा दिया। उसने एक ही झटके में कशिश की दोनों नाज़ुक कलाइयों को अपने एक हाथ में जकड़ लिया और उन्हें दीवार से सटा दिया। कशिश का पूरा बदन बीस्ट के फौलादी जिस्म से चिपक गया। दोनों की धड़कनें इतनी तेज़ थीं कि इस खामोश कमरे में साफ़ सुनी जा सकती थीं।
बीस्ट ने कशिश के चेहरे के बेहद करीब आकर, कड़क और दीवाने लहजे में कहा, "हाँ, मैं शैतान हूँ, कशिश। लेकिन याद रखना... यह शैतान सिर्फ तुम्हारी इबादत करता है। आज से तुम्हारी इस मासूमियत पर, तुम्हारी इस रूह पर सिर्फ मेरा नाम लिखा है। अगर यहाँ से भागने की सोची भी, तो अंजाम पूरा बनारस भुगतेगा।"
कशिश ने बेबसी से बीस्ट की आँखों में देखा। उसे समझ आ गया था कि इस मर्द की दीवानगी की कोई सीमा नहीं है। वह धीरे से शांत हो गई, और उसकी आँखें फिर से डबडबा गईं। कशिश को टूटता देख बीस्ट ने धीरे से उसकी कलाइयों को छोड़ दिया। उसने टेबल से दूध का ग्लास उठाया और कशिश के होठों के पास कर दिया।
"इसे पी लो। मुझे मेरी एंजेल का कमज़ोर होना बिल्कुल पसंद नहीं है," बीस्ट ने आदेशात्मक लेकिन नर्म लहजे में कहा। कशिश ने बिना कोई विरोध किए कांपते हाथों से ग्लास ले लिया। बीस्ट ने उसके सिर पर एक बार हाथ फेरा और बिना कुछ कहे कमरे से बाहर निकल गया।रात के ठीक बारह बज रहे थे। किंगडम के मुख्य वॉर-रूम में बीस्ट अपनी बड़ी महोगनी की चेयर पर बैठा हुआ था। कमरे की बत्तियाँ मद्धम थीं, और टेबल पर बनारस के पूरे अंडरवर्ल्ड का एक नक्शा फैला हुआ था। समीर गंभीर मुद्रा में उसके बगल में खड़ा था।
"भाईसाहब, मणिकर्णिका घाट पर जो हमने सिंहानिया के आदमियों को कुचला था, उसके बाद सिंहानिया बौखला गया है," समीर ने कुछ तस्वीरें टेबल पर रखते हुए कहा। "वह नेपाल से कुछ और पेशेवर शूटरों को बुला रहा है। हमें खबर मिली है कि वह कशिश भाभी जी के बारे में भी जानकारी जुटा रहा है। वह जानता है कि आपकी कमज़ोरी अब कौन है।"
यह सुनते ही बीस्ट के चेहरे की रगों में खून तेज़ी से दौड़ने लगा। उसकी आँखों में वही खूंखार 'बीस्ट' दोबारा जाग उठा। उसने अपनी दाहिनी कलाई के चांदी के कड़े को मेज पर इतनी ज़ोर से पटका कि लकड़ी की मेज पर एक गहरा गड्ढा बन गया।
"मेरी कमज़ोरी?" बीस्ट की आवाज़ में एक डरावनी गूँज थी। "सिंहानिया को गलतफहमी हो गई है, समीर। कशिश मेरी कमज़ोरी नहीं, बल्कि इस बीस्ट का वो कवच है जिसके लिए मैं पूरी दुनिया को श्मशान बना सकता हूँ। सिंहानिया ने अगर मेरी एंजेल की तरफ देखने की भी जुर्रत की, तो मैं उसे ऐसी मौत दूँगा कि खुद यमराज भी कांप उठेंगे।"
बीस्ट अपनी चेयर से खड़ा हुआ और अपनी गन को लोड करते हुए खिड़की के पास गया, जहाँ से कशिश के कमरे की बालकनी साफ़ दिखाई देती थी।
"समीर, पूरे बनारस को हाई-अलर्ट पर डाल दो। सिंहानिया के जितने भी अवैध ठिकाने हैं, उन्हें आज रात ही आग के हवाले कर दो। और कशिश के कमरे के बाहर सुरक्षा चौगुनी कर दो। जंग की शुरुआत उसने की है, लेकिन इसका खूनी अंत सिर्फ यह बीस्ट करेगा।"
[एक तरफ बीस्ट का अपनी एंजेल के लिए पागलपन, और दूसरी तरफ दुश्मनों की साज़िश... कहानी अब एक महा-युद्ध की तरफ बढ़ रही है]
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बीस्ट का कशिश को अपने 'किंग덤' में लाना और उसकी कलाइयों को पकड़कर अपनी बेपनाह दीवानगी का इज़हार करना—दोनों के बीच का यह रोमांटिक और डार्क टकराव आपको कैसा लगा?
सिंहानिया अब कशिश को निशाना बनाने की साज़िश रच रहा है। क्या बीस्ट अपनी एंजेल को इस आने वाले बड़े खतरे से बचा पाएगा?
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