02

शैतान का सौदा

दशाश्वमेध घाट की उस सर्द रात को बीते बारह घंटे से ज्यादा का वक्त हो चुका था, लेकिन बनारस के बेताज बादशाह, जिसे लोग थर-थर कांपते हुए 'द बीस्ट' कहते थे, उसकी रातों की नींद और दिन का चैन पूरी तरह उड़ चुका था। वह अपने आलीशान, डार्क थीम वाले शीशमहल जैसे केबिन में बिना शर्ट के, सिर्फ ब्लैक ट्राउजर पहने चक्कर काट रहा था। उसकी चौड़ी फौलादी पीठ पर छपे गोलियों के पुराने निशान धूप की मद्धम रोशनी में और गहरे दिख रहे थे।

जब भी वह आँखें बंद करता, उसे कोहरे के बीच से उभरता कशिश का वह मासूम, रोता हुआ चेहरा और उसकी पतली कमर पर हुआ अपना पहला स्पर्श याद आ जाता। उसकी उंगलियों में आज भी कशिश के जिस्म की वो खुशबू रची हुई थी।

"एक मामूली, कमज़ोर लड़की ने इस बीस्ट को एक पल में कैसे बेबस कर दिया?" उसने गुस्से में आकर टेबल पर रखा कीमती क्रिस्टल का एशट्रे दीवार पर दे मारा। एशट्रे के परखच्चे उड़ गए।

तभी कमरे का भारी दरवाज़ा खुला और उसका सबसे वफ़ादार राइट-हैंड समीर अंदर दाखिल हुआ। समीर ने बीस्ट के इस उग्र रूप को देखकर अपनी गर्दन अदब से झुका ली। "भाईसाहब, आपने जिस लड़की के बारे में पता लगाने को कहा था... उसकी पूरी कुंडली निकाल लाया हूँ।"

बीस्ट तुरंत घूमा, उसकी गहरी आँखों में एक अजीब सी भूख और ललक चमक उठी। "बोल!"

"भाईसाहब, उसका नाम कशिश है। वह घाट के पीछे वाली जर्जर और तंग 'पंडित गली' के आखिरी मकान में रहती है। उसके पिता, शास्त्री जी, मंदिर के एक बेहद सीधे और गरीब पुजारी हैं। उन्हें दिल की एक बहुत गंभीर बीमारी है। डॉक्टरों ने कह दिया है कि अगर अगले दो दिनों के भीतर उनका ऑपरेशन नहीं हुआ, तो वे दम तोड़ देंगे। ऑपरेशन का खर्च करीब पांच लाख रुपए है, जो उस परिवार के लिए नामुमकिन है," समीर ने सांस रोककर पूरी बात बताई।

समीर ने थोड़ा रुककर आगे कहा, "एक और बात है भाईसाहब... शहर का जो लालची और अय्याश सूदखोर है, मंगत राम, उसने शास्त्री जी को तीन लाख का कर्ज़ दे रखा है। वह आज दोपहर को कशिश के घर पर कब्ज़ा करने और उस लड़की को उठाने की धमकी दे रहा है।"

यह सुनते ही बीस्ट की दाहिनी कलाई का चांदी का कड़ा खनक उठा। उसके चेहरे पर एक बेहद खूंखार, डरावनी मुस्कान उभर आई। उसकी आँखें सुलगते हुए अंगारे जैसी हो गईं। "मंगत राम की इतनी मजाल? उसने यह सोच भी कैसे लिया कि जिस 'एंजेल' पर इस बीस्ट की नज़र पड़ चुकी है, उसे कोई और छू भी सकता है? समीर, गाड़ियाँ निकालो। आज हम बनारस के सुल्तान बनकर नहीं, बल्कि अपनी जागीर का सौदा करने उसकी चौखट पर जाएंगे।"

उधर 'पंडित गली' के उस छोटे से, सीलन भरे जर्जर मकान के भीतर का मंज़र बेहद दर्दनाक था। कमरे में एक फटे हुए गद्दे पर बूढ़े शास्त्री जी लेटे हुए थे, जो सांस लेने के लिए बुरी तरह तड़प रहे थे। कशिश उनके सिरहाने बैठी रोते हुए उनके सीने को सहला रही थी। उसने आज हल्के पीले रंग का एक पुराना सलवार-सूट पहन रखा था, जिसमें उसकी सादगी और निश्छल सुंदरता किसी देवी जैसी लग रही थी।

"बाबूजी, आप हिम्मत मत हारिए। मैं... मैं अभी डॉक्टर के पास जाती हूँ। मैं उनके पैर पकड़ लूँगी, वे दवा ज़रूर दे देंगे," कशिश ने सिसकते हुए कहा, उसके गालों पर आँसू लगातार बह रहे थे।

"बेटी... इस दुनिया में बिना पैसों के कोई सांस भी नहीं लेने देता। मेरी फिक्र मत कर, बस अपनी रक्षा करना..." शास्त्री जी ने कांपते हाथों से कशिश का सिर चूमा।

ठीक उसी समय, घर का पुराना लकड़ी का दरवाज़ा किसी ने बेहद क्रूरता से लात मारकर तोड़ दिया। दरवाज़ा सीधे फर्श पर गिरा और धूल का गुबार उड़ गया। बाहर सूदखोर मंगत राम अपने चार तगड़े, लाठियों और चाकुओं से लैस लठैतों के साथ खड़ा था। उसके पान से सने होठों पर एक बेहद घिनौनी और गंदी मुस्कान थी।

"क्यों बे बुड्ढे शास्त्री! आज महीने का आखिरी दिन है। मेरे तीन लाख रुपए और उसका ब्याज कहाँ है? अगर अभी के अभी माल बाहर नहीं निकाला, तो इस खटिया समेत तुझे सड़क पर फेंक दूँगा," मंगत राम चिल्लाया।

कशिश घबराकर तुरंत अपने लाचार पिता के आगे ढाल बनकर खड़ी हो गई। उसने अपने कांपते हाथ जोड़ दिए। "साहब, भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए। मेरे बाबूजी मर जाएंगे। मुझे सिर्फ दो दिन की मौलत दे दीजिए, मैं कहीं से भी मजदूरी करके आपके पैसे चुका दूँगी।"

मंगत राम आगे बढ़ा और उसने कशिश के चेहरे को अपनी गंदी नज़रों से ऊपर से नीचे तक नापा। "मजूरी करेगी तू? अरे इस जन्नत जैसे बदन से मजदूरी कराएगी तो भगवान को भी पाप लगेगा लड़की। पैसे नहीं हैं तो कोई बात नहीं... एक रात के लिए हमारे बंगले पर चल। तेरा यह बुड्ढा बाप भी ठीक हो जाएगा और तेरा कर्जा भी माफ़।" यह कहकर मंगत राम ने कशिश का दुपट्टा पकड़ने के लिए अपना हाथ आगे बढ़ाया।

"दूर रहिए मुझसे! मुझे मत छुओ!" कशिश डर के मारे चीख उठी और पीछे हट

मंगत राम की गंदी उंगलियाँ कशिश के दुपट्टे को छू भी पातीं, उससे पहले ही एक फौलादी, वज्र जैसा भारी हाथ हवा को चीरता हुआ आया और उसने मंगत राम की कलाई को बीच में ही दबोच लिया।

पकड़ इतनी खूंखार और जानलेवा थी कि मंगत राम की कलाई की हड्डियाँ कड़-कड़ करके टूटने लगीं। "अहहह! छोड़ो... कौन है बे? मेरी कलाई तोड़ दी!" मंगत राम दर्द के मारे घुटनों के बल आ गिरा।

जैसे ही उसने और उसके लठैतों ने घूमकर दरवाजे की तरफ देखा, पूरे कमरे का तापमान जैसे शून्य हो गया।

दरवाजे पर 'द बीस्ट' खड़ा था। उसने काले रंग का रेशमी पठान सूट पहन रखा था, आँखों पर डार्क चश्मा था, और उसके होठों पर एक ठंडी, कातिलाना खामोशी थी। उसके ठीक पीछे समीर और बीस हथियारबंद गार्ड्स पूरी गली को घेरकर खड़े थे। पूरी गली में सन्नाटा पसर चुका था।

"बी... बीस्ट भाईसाहब! आप... आप यहाँ?" मंगत राम का पूरा बदन डर के मारे थर-थर कांपने लगा, उसका पेशाब छूटने को हो गया। वह जानता था कि बीस्ट का मतलब है साक्षात यमराज।

बीस्ट ने मंगत राम की तरफ देखा तक नहीं। उसकी जलती हुई भूरी आँखें सीधे कोने में खड़ी कशिश पर जाकर टिक गईं, जो अपनी बड़ी-बड़ी आँखों में खौफ और हैरानी लिए उसे देख रही थी। वह पहचान गई थी कि यह वही घाट वाला खूंखार रक्षक है।

"मंगत राम..." बीस्ट की भारी, गहरी और गूँजती आवाज़ कमरे की सीलन भरी दीवारों से टकराई। "तूने किस हाथ से मेरी 'एंजेल' को छूने की कोशिश की?"

"भा... भाईसाहब, मुझे नहीं पता था कि यह लड़की आपकी औरत है! मुझे माफ़ कर दीजिए!" मंगत राम रोने लगा।

"समीर..." बीस्ट ने बिना नज़रे हटाए बहुत ही शांत लहजे में हुक्म दिया। "इसके दोनों हाथ काट दो। ताकि इसे याद रहे कि जो चीज़ इस बीस्ट की नज़रों में आ चुकी है, उसे छूने की कीमत क्या होती है।"

"नहीं! भाईसाहब नहीं!" मंगत राम की चीखें गूँज उठीं, लेकिन बीस्ट के गार्ड्स ने उसे और उसके गुर्गों को बेरहमी से घसीटते हुए बाहर गली में निकाल दिया। कुछ ही पलों में बाहर से हड्डियों के कटने और तड़पने की खौफनाक आवाजें आईं और फिर सब शांत हो गया।

कमरे के भीतर अब सिर्फ बीस्ट, कशिश और बेड पर लेटे शास्त्री जी थे। बीस्ट बहुत ही धीमी, नपी-तुली और राजसी चाल चलता हुआ कशिश के बिल्कुल करीब आकर खड़ा हो गया। कशिश का दिल इतनी ज़ोर से धड़क रहा था मानो उसकी छाती चीरकर बाहर आ जाएगा। बीस्ट के बदन से महंगी सिगार और बारूद की एक मिली-जुली, मर्दाना खुशबू आ रही थी।

बीस्ट ने अपनी जेब से पांच लाख रुपए की गड्डी और शहर के सबसे बड़े सुपर-स्पेशलिटी हॉस्पिटल के वीआईपी बेड का पर्चा टेबल पर रख दिया।

"तुम्हारे बाप की एम्बुलेंस बाहर खड़ी है। अगले एक घंटे में उनका ऑपरेशन शुरू हो जाएगा। और यह मकान अब हमेशा के लिए तुम्हारा है," बीस्ट ने कशिश की आँखों में देखते हुए कहा।

कशिश ने रोते हुए, अपनी कांपती आवाज़ में पूछा, "आप... आप हमारे लिए यह सब क्यों कर रहे हैं? आप तो इस शहर के सबसे बड़े अपराधी हैं। बदले में... बदले में आपको हमसे क्या चाहिए?"

बीस्ट थोड़ा और झुका। उसने बहुत ही कोमलता से, अपनी फौलादी उंगली से कशिश के गाल पर बहते एक आँसू को पोंछा। उसका यह स्पर्श कशिश के पूरे बदन में बिजली की तरह दौड़ गया। बीस्ट की आँखों में एक अजीब सा पागलपन था।

"बदले में मुझे कुछ नहीं चाहिए, कशिश... बस आज से और इसी वक्त से, तुम्हारी इस पावन ज़िंदगी, तुम्हारी इन खूबसूरत आँखों के आंसुओं, और तुम्हारी हर एक आती-जाती सांस पर सिर्फ और सिर्फ इस 'बीस्ट' का हक होगा। तुम इस शैतान के पिंजरे की वो एंजेल हो, जिसे अब भगवान भी मुझसे नहीं छीन सकता।"

यह कहकर बीस्ट मुड़ा और अपनी भारी धमक के साथ बाहर निकल गया। कशिश वहीं जमी रह गई—उसके पिता की जान बच चुकी थी, लेकिन वह खुद हमेशा के लिए एक शैतान की मुट्ठी में कैद हो चुकी थी।ने लगी।

प्यारे पाठकों! 'The Beast and His Angel' का यह दूसरा अध्याय आपको कैसा लगा? कमेंट बॉक्स को अपनी थ्योरीज़ से भर दीजिए:

बीस्ट का कशिश के घर आकर सूदखोर मंगत राम के हाथ काटने की सजा देना और कशिश को अपनी अमानत घोषित करना—बीस्ट का यह खूंखार अंदाज़ आपको कैसा लगा?

क्या कशिश अपने पिता की जान बचाने के बदले बीस्ट के इस 'डार्क सौदे' और उसकी दीवानगी को स्वीकार कर पाएगी?

Write a comment ...

Write a comment ...