इस खूनी और अंधेरे मंज़र से ठीक आधा किलोमीटर दूर, दशाश्वमेध घाट की सीढ़ियों पर एक बिल्कुल अलग, अलौकिक और शांत दुनिया सांस ले रही थी। रात के नौ बज रहे थे, और घाट पर आरती खत्म होने के बाद भीड़ छंट चुकी थी। गंगा की मद्धम लहरों के पास, सीढ़ियों पर एक बेहद नाज़ुक, अत्यंत खूबसूरत और भोली लड़की बैठी थी—कशिश।
कशिश बनारस के एक सीधे-साधे, गरीब और प्रतिष्ठित पंडित शास्त्री जी की बेटी थी। उसकी उम्र लगभग बाईस साल थी। उसने हल्के आसमानी रंग का एक साधारण सा सूती सलवार-सूट पहन रखा था, और उसका सफेद दुपट्टा हवा के झोंकों से बार-बार उसकी पीठ पर लहरा रहा था। कशिश का रंग बिल्कुल कंचन जैसा गोरा था, और उसकी बड़ी-बड़ी, हिरनी जैसी आँखें इतनी पवित्र थीं कि उनमें दुनिया की किसी बुराई या चालाकी का कोई साया नहीं था। वह इस बीस्ट की दुनिया की असली 'एंजेल' थी।
वह गंगा माँ के पानी में एक छोटा सा मिट्टी का दीया प्रवाहित कर रही थी। उसने अपनी आँखें बंद कर रखी थीं और उसके गुलाबी होठों से बहुत ही मीठी, खनकती आवाज़ में एक प्रार्थना निकल रही थी।
"हे गंगा मैया... मेरे बाबूजी की तबीयत बहुत खराब है। डॉक्टर ने बड़ी बीमारी बताई है और दवाइयों के लिए बहुत पैसों की ज़रूरत है। हमारे पास इतने पैसे नहीं हैं, लेकिन मुझे आप पर पूरा भरोसा है। कोई न कोई रास्ता ज़रूर दिखाना माँ," कशिश की आँखों के कोने से एक पवित्र आँसू टपक कर उसके गाल पर बह गया।
वह अपनी प्रार्थना में इतनी खोई हुई थी कि उसे भनक भी नहीं लगी कि घाट के ऊपरी हिस्से से शहर के तीन-चार रईस, आवारा और मनचले लड़के उसकी तरफ बढ़ रहे थे। वे लड़के पिछले काफी दिनों से कशिश पर बुरी नज़र रखे हुए थे, और आज सुनसान घाट देखकर उनकी हिम्मत बढ़ गई थी।
"वाह यार! बनारस के घाट पर आज इतनी सुंदर अप्सरा अकेली बैठी है," उनका लीडर, जिसने हाथ में शराब की बोतल ले रखी थी, कशिश के बिल्कुल करीब आकर खड़ा हो गया।
कशिश ने घबराकर अपनी आँखें खोलीं और अजनबियों को इतने करीब देखकर वह तुरंत खड़ी हो गई। "आप... आप लोग कौन हैं? कृपया मेरे रास्ते से हट जाइए, मुझे घर जाना है।"
"अरे इतनी जल्दी क्या है, कशिश डार्लिंग? इस बनारस की ठंडी रात में थोड़ी गुफ़्तगू तो करती जाओ। तुम्हारे बाबूजी के पास तो पैसे नहीं हैं, लेकिन हमारे पास बहुत पैसा है। एक रात हमारे साथ बिताओ, तुम्हारी सारी गरीबी दूर कर देंगे," दूसरे लड़के ने एक बेहद भद्दी और गंदी हंसी हंसते हुए कशिश की तरफ कदम बढ़ाया।
"दूर रहिए मुझसे! भगवान के लिए मुझे जाने दीजिए! कोई बचाओ!" कशिश डर के मारे ज़ोर से चिल्लाई। उसकी आँखों से अविरल आँसू बहने लगे। वह पीछे हटने लगी, लेकिन सीढ़ियों की ढलान और कोहरे के कारण उसका पैर फिसल गया। वह अपना संतुलन खो बैठी और सीधे पीछे की तरफ, पत्थरों पर गिरने ही वाली थी।कशिश का नाज़ुक शरीर उन ठंडे, नुकीले पत्थरों पर गिरता, उससे पहले ही हवा को चीरते हुए एक बेहद विशाल, मजबूत और फौलादी बांह ने उसकी पतली कमर को हवा में ही जकड़ लिया।
कशिश ने डर के मारे अपनी आँखें कसकर बंद कर ली थीं, उसे लगा था कि उसे बहुत चोट आएगी। लेकिन उसे दर्द के बजाय एक ऐसा अहसास हुआ मानो वह किसी फौलादी, अटूट चट्टान की ओट में आ गई हो। उसने बहुत ही धीमे से अपनी लंबी पलकें खोलीं।
सामने 'द बीस्ट' खड़ा था।
कशिश की बड़ी-बड़ी, पानी से भरी आँखें सीधे बीस्ट की उन खूंखार, जलती हुई भूरी आँखों से जा टकराईं। बीस्ट के काले कुर्ते पर अभी भी दुश्मनों के खून के ताज़े धब्बे चमक रहे थे। लेकिन जैसे ही बीस्ट की नज़रों ने कशिश के उस डरे हुए, मासूम और जन्नत जैसी खूबसूरत चेहरे को देखा... उसके पत्थर जैसे दिल के भीतर जैसे एक बहुत बड़ा भूचाल आ गया।
जो बीस्ट आज तक किसी के आगे नहीं झुका था, जिसने अपनी ज़िंदगी में कभी किसी औरत को मुड़कर नहीं देखा था, वह आज कशिश की उन मासूम आँखों और उसके जिस्म की खुशबू में पूरी तरह से कैद हो गया।
"कौ... कौन हो तुम? छोड़ो मुझे," कशिश ने बीस्ट के चौड़े, फौलादी सीने पर अपनी छोटी, नाज़ुक हथेलियाँ रखकर उसे पीछे धकेलने की कोशिश की। लेकिन बीस्ट अपनी जगह पर एक इंच भी नहीं हिला।
बीस्ट ने बहुत ही आराम से कशिश को सीधा खड़ा किया, लेकिन उसकी कमर पर से अपनी पकड़ तुरंत नहीं हटाई। उसने घूमकर उन आवारा लड़कों की तरफ देखा। "तुम्हारी यह मजाल... कि इस बनारस की मिट्टी पर, 'द बीस्ट' के रहते हुए किसी मासूम पर हाथ डालो?" बीस्ट की आवाज़ में वो कड़कड़ाहट थी कि उन लड़कों का नशा एक सेकंड में उतर गया।
"बी... बीस्ट भाईसाहब! हमें माफ़ कर दीजिए! हमें नहीं पता था कि यह लड़की आपकी अमानत है!" लड़कों के पैर थर-थर कांपने लगे। वे बिना एक पल गंवाए, वहाँ से दुम दबाकर भाग खड़े हुए।
घाट पर अब सिर्फ सन्नाटा था। गंगा की ठंडी हवाएँ चल रही थीं, जो कशिश के बालों को उड़ाकर बार-बार बीस्ट के चेहरे से छुआ रही थीं।
बीस्ट ने बहुत ही धीमे से कशिश की कमर से अपना हाथ हटाया। उसने अपनी जेब से एक साफ़, सफेद रुमाल निकाला और कशिश की तरफ बढ़ाया। "आँसू पोंछ लो अपने। आज के बाद इस शहर में कोई भी तुम्हारी तरफ आँख उठाने की औकात भी नहीं रखेगा।"
कशिश ने उस रुमाल को देखा, फिर उसकी नज़र बीस्ट के कुर्ते पर लगे खून के धब्बों पर गई। वह अंदर तक सिहर उठी। उसने बिना रुमाल लिए, हाथ जोड़कर कांपती आवाज़ में कहा, "आ... आपका बहुत-बहुत धन्यवाद," और वह तुरंत पलटकर, सीढ़ियों से ऊपर की तरफ अपने घर की ओर भाग गई।
बीस्ट वहीं खड़ा रहा। उसने अपनी उस हथेली को देखा, जिससे उसने अभी कशिश को थामा था। उसके होठों पर एक ऐसी गहरी, दीवानी और रहस्यमयी मुस्कान उभर आई।
"कशिश... नाम की तरह ही इस बीस्ट के दिल में एक अजीब सी कशिश पैदा कर गई। वह इस शहर का एक पावन फरिश्ता है, मेरी 'एंजेल' है। और यह बीस्ट अब उसे किसी और का होने नहीं देगा।"
प्यारे पाठकों! इस नए कड़क टाइटल 'The Beast and His Angel' के साथ यह पहला अध्याय आपको कैसा लगा?
बीस्ट की खूंखार एंट्री और कशिश की बेपनाह मासूमियत का यह पहला टकराव आपको कितना दमदार लगा?
क्या कशिश इस खतरनाक इंसान की पकड़ और साए से दूर भाग पाएगी?
अगले भाग (Chapter 2) को देखने के लिए कमेंट बॉक्स में 'Haa' या 'Next' लिखना न भूलें!बनारस की सुबह जितनी अलौकिक और पवित्र होती थी, उसकी रातें उतनी ही रहस्यमयी और खतरनाक थीं। गंगा के घाटों पर बजने वाले शंख और डमरू की गूँज जहाँ आत्मा को सुकून देती थी, वहीं शहर के संकरे, अंधेरे गलियारों में एक ऐसा नाम गूँजता था जिससे बड़े-बड़े माफियाओं के कलेजे कांप उठते थे। लोग उसे खौफ और अदब से 'द बीस्ट' (The Beast) कहते थे।
उसका असली नाम इस शहर के इतिहास के पन्नों में कहीं दफन हो चुका था। उम्र लगभग बत्तीस साल, छह फीट दो इंच का ऊंचा, गठीला और फौलादी बदन। उसकी चौड़ी छाती और मजबूत बाहों पर पुरानी जंग और गोलियों के कई गहरे निशान थे, जो इस बात की गवाही देते थे कि वह मौत के मुंह से कितनी ही बार हंसकर वापस लौटा था। कानों में एक छोटा सा सोने का छल्ला और दाहिने हाथ की कलाई पर एक भारी चांदी का कड़ा हमेशा मौजूद रहता था।
सर्दियों की एक ठंडी रात थी। कोहरे की एक घनी, सफेद चादर ने पूरी गंगा नदी और घाटों को अपनी आगोश में ले रखा था। मणिकर्णिका घाट पर कुछ चिताएं अभी भी मद्धम आग में जल रही थीं। इस श्मशान घाट से कुछ ही दूरी पर स्थित एक पुरानी, खंडहर हो चुकी हवेली के भीतर कुछ साए हरकत कर रहे थे। ये शहर के सबसे बड़े ड्रग पेडलर और इंटरनेशनल स्मगलर 'सिंहानिया' के खास गुर्गे थे। वे नेपाल के रास्ते आई हथियारों की एक बहुत बड़ी खेप का सौदा करने के लिए वहाँ इकट्ठा हुए थे।
"जल्दी करो! माल को नावों में लोड करो। अगर 'बीस्ट' के आदमियों को भनक भी लग गई, तो बनारस की इस मिट्टी पर हमारी लाशें बिछा दी जाएंगी," उनका लीडर अपनी कांपती आवाज़ में गुर्गों को हिदायत दे रहा था।
"जब मौत सिर पर खड़ी हो, तो फिक्र करने से कोई फायदा नहीं होता..." अंधेरे के एक सूने कोने से एक बेहद भारी, ठंडी और मर्दाना आवाज़ गूँजी।
सारे गुर्गे अपनी जगह पर जड़ हो गए। उन्होंने चौंककर देखा। खंडहर के मुख्य दरवाज़े के मलबे को हटाते हुए 'द बीस्ट' अकेले अंदर दाखिल हुआ। उसके हाथ में कोई हथियार नहीं था, उसकी दोनों हथेलियाँ उसके कुर्ते की जेबों में थीं, और उसके चेहरे पर एक बेहद जानलेवा, शांत भाव था।
उसे अकेला देखकर सिंहानिया के लीडर को थोड़ा हौसला मिला। उसने तुरंत अपनी ऑटोमैटिक पिस्टल बीस्ट की छाती पर तान दी। "बीस्ट! तू अपनी मौत को खुद बुलावा देने यहाँ आया है। आज तू अकेला है, और हम दस। तेरी यह बादशाहत आज इसी खंडहर में दफन हो जाएगी।"
बीस्ट ने अपनी जेब से हाथ बाहर निकाला। उसने अपनी दाहिनी कलाई के भारी चांदी के कड़े को थोड़ा घुमाया और अपनी गर्दन को एक झटका दिया। उसके होठों पर एक बेहद क्रूर और शातिर मुस्कान उभर आई।
"दस गीदड़ मिलकर भी एक शेर का शिकार नहीं कर सकते। और रही बात अकेले होने की... तो इस बीस्ट के लिए तुम जैसे कीड़े-मकोड़ों को कुचलने के लिए एक हाथ ही काफी है।"
"मारो इसे!" लीडर चिल्लाया।
इससे पहले कि किसी की उंगली ट्रिगर पर दब पाती, बीस्ट एक फौलादी चीते की रफ़्तार से आगे बढ़ा। उसने सबसे पहले सामने खड़े गुर्गे की कलाई को दबोचा और उसे विपरीत दिशा में घुमा दिया। एक खौफनाक चीख के साथ कलाई की हड्डी टूट गई। बीस्ट ने उसकी गन हवा में ही कैच की और उसकी बट से दूसरे गुर्गे के चेहरे पर ज़ोरदार वार किया। नाक की हड्डी टूटने की आवाज़ आई और वह खून की उल्टी करता हुआ ज़मीन पर गिर पड़ा।
बाकी के लोग अपनी तलवारें और चाकू लेकर एक साथ बीस्ट पर झपटे। लेकिन बीस्ट का शरीर किसी ठोस चट्टान की तरह अभेद्य था। उसने घूमकर अपने दाहिने पैर की एक ऐसी फौलादी किक एक गुर्गे की पसलियों पर मारी कि वह हवा में लहराता हुआ सीधे खंडहर के खंभे से जा टकराया। मात्र पांच मिनट के भीतर, सिंहानिया के सारे पेशेवर गुर्गे ज़मीन पर खून से लथपथ होकर रेंग रहे थे।
उसने ज़मीन पर तड़प रहे लीडर के सीने पर अपना भारी बूट रख दिया और नीचे झुककर उसकी फटी हुई आँखों में अपनी ठंडी नज़रों को गड़ा दिया। "सिंहानिया को जाकर कह देना... बनारस की सीमा में ज़हर बेचने की सज़ा सिर्फ मौत है। आज मैंने तुम्हें ज़िंदा छोड़ा है ताकि तुम मेरा यह पैगाम उस तक पहुँचा सको। अगर दोबारा इस तरफ कदम रखा, तो मणिकर्णिका की चिता पर अगला नंबर उसका होगा।"
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